आजादी के बाद भी 55 साल तक नहीं थी आम भारतीय को तिरंगा फहराने की अनुमति, इस उद्योगपति ने लंबी लड़ाई लड़ दिलाया अधिकार; क्या है कहानी?

स्वतंत्र भारत में 1947 से 2002 तक आम नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अनुमति नहीं थी, केवल सरकारी भवनों और विशेष अवसरों पर सीमित थी। उद्योगपति नवीन जिंदल ने 1994 में अपनी फैक्ट्री में तिरंगा फहराकर चुनौती दी, जिसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। 2002 में फ्लैग कोड में संशोधन से हर भारतीय को यह अधिकार मिला, जो राष्ट्रीय गौरव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूत करता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को फहराने के नियम बेहद सख्त थे। 1947 में आजादी मिलने के बावजूद, आम नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों या निजी स्थानों पर तिरंगा फहराने की इजाजत नहीं थी। यह अधिकार केवल सरकारी इमारतों, राजनयिक मिशनों और विशेष राष्ट्रीय दिवसों जैसे 15 अगस्त और 26 जनवरी तक सीमित था। फ्लैग कोड ऑफ इंडिया, जो 1947 में लागू हुआ, स्पष्ट रूप से कहता था कि राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग केवल आधिकारिक उद्देश्यों के लिए हो सकता है, और इसका अपमान माना जाना किसी भी अनधिकृत फहराने को दंडनीय बनाता था। इससे आम भारतीयों में राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सम्मान तो था, लेकिन इसे व्यक्तिगत रूप से प्रदर्शित करने की आजादी नहीं।

इस प्रतिबंध की जड़ें ब्रिटिश काल से जुड़ी थीं, जहां ध्वज फहराना औपनिवेशिक शक्ति का प्रतीक था। आजादी के बाद भी सरकार ने इसे बनाए रखा, ताकि ध्वज का दुरुपयोग न हो। लेकिन 1990 के दशक में एक युवा उद्योगपति ने इस परंपरा को चुनौती दी। नवीन जिंदल, जो Jindal Steel and Power Limited के प्रमुख थे, ने अमेरिका से पढ़ाई पूरी कर भारत लौटने के बाद अपनी रायगढ़ स्थित फैक्ट्री में तिरंगा फहराना शुरू किया। 1994 में जब उन्होंने प्लांट परिसर में ध्वज फहराया, तो स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें रोक दिया और नोटिस जारी किया। अधिकारियों का तर्क था कि फ्लैग कोड के मुताबिक, निजी संपत्ति पर साल भर तिरंगा फहराना अवैध है।

See also  भारत ने साइन किया इतिहास का सबसे बड़ा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, 'मदर ऑफ ऑल डील' पर लग गई अंतिम मुहर

नवीन जिंदल ने इसे व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन माना। उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रीय ध्वज फहराना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत संरक्षित है। 1995 में उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की, जिसमें फ्लैग कोड की धाराओं को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की। याचिका में उन्होंने कहा कि ध्वज फहराना राष्ट्रीय गौरव व्यक्त करने का माध्यम है, और इसे प्रतिबंधित करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई की और 1996 में फैसला सुनाया कि आम नागरिकों को सम्मानजनक तरीके से तिरंगा फहराने का अधिकार है।

लेकिन केंद्र सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सरकार का पक्ष था कि अनियंत्रित फहराने से ध्वज का अपमान बढ़ सकता है, और राष्ट्रीय प्रतीक की गरिमा बनाए रखने के लिए प्रतिबंध जरूरी हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबा चला, जहां जस्टिस बी एन किरपाल की बेंच ने सुनवाई की। कोर्ट ने विभिन्न देशों के ध्वज नियमों का अध्ययन किया, जैसे अमेरिका में जहां नागरिक साल भर स्टार्स एंड स्ट्राइप्स फहरा सकते हैं। अंत में, 23 जनवरी 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि हर भारतीय को आदर के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराने का मौलिक अधिकार है। लेकिन इससे पहले ही, 26 जनवरी 2002 को सरकार ने फ्लैग कोड में संशोधन कर दिया, जिससे आम नागरिकों को साल के किसी भी दिन तिरंगा फहराने की अनुमति मिल गई।

यह संशोधन नवीन जिंदल की लड़ाई का सीधा नतीजा था। नए नियमों में स्पष्ट किया गया कि ध्वज को सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जा सकता है, इसे उलटा या क्षतिग्रस्त नहीं किया जा सकता, और इसे अन्य ध्वजों से ऊपर रखना अनिवार्य है। साथ ही, ध्वज का आकार और सामग्री पर दिशानिर्देश दिए गए, जैसे खादी या कॉटन से बना होना। इस बदलाव से भारत में राष्ट्रवाद की नई लहर आई, जहां स्कूलों, घरों और व्यावसायिक स्थलों पर तिरंगा आम दृश्य बन गया।

See also  भारत-अमेरिका डील: चीन समेत प्रतिस्पर्धी देशों से कम भारत का टैरिफ, जोखिम भी घटा, वैश्विक पूंजी के लिए फिर से आकर्षक बना भारत

कानूनी लड़ाई का समयरेखा

वर्षघटनाविवरण
1947स्वतंत्रता प्राप्तिफ्लैग कोड लागू, आम फहराने पर प्रतिबंध।
1994नवीन जिंदल का प्रयासरायगढ़ फैक्ट्री में तिरंगा फहराया, अधिकारियों ने रोका।
1995PIL दाखिलदिल्ली हाईकोर्ट में याचिका, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला।
1996हाईकोर्ट फैसलानागरिकों को अधिकार दिया, लेकिन सरकार ने अपील की।
2002फ्लैग कोड संशोधन26 जनवरी को नए नियम, साल भर फहराने की अनुमति।
2004सुप्रीम कोर्ट फैसला23 जनवरी को अंतिम पुष्टि, मौलिक अधिकार घोषित।

इस लड़ाई ने न केवल ध्वज फहराने का अधिकार दिलाया, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था में नागरिक सक्रियता का उदाहरण स्थापित किया। नवीन जिंदल, जो उस समय 25 वर्ष के थे, ने अकेले सरकार के खिलाफ खड़े होकर दिखाया कि व्यक्तिगत पहल से राष्ट्रीय बदलाव संभव है। उनकी पृष्ठभूमि एक उद्योगपति की थी, जहां Jindal Group स्टील उत्पादन में अग्रणी है, लेकिन उन्होंने इसे राष्ट्रीय मुद्दे से जोड़ा। कोर्ट में उनके वकीलों ने तर्क दिया कि ध्वज फहराना राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है, न कि कमजोर। विरोधी पक्ष ने अपमान की आशंका जताई, लेकिन कोर्ट ने कहा कि दुरुपयोग रोकने के लिए अलग कानून हैं, जैसे Prevention of Insults to National Honour Act, 1971।

संशोधन के बाद, भारत में तिरंगे का उपयोग बढ़ा। उदाहरण के लिए, खेल आयोजनों में प्रशंसक अब स्टेडियम में तिरंगा लहराते हैं, जो पहले प्रतिबंधित था। कॉर्पोरेट सेक्टर में कंपनियां अपने कैंपस पर साल भर ध्वज फहराती हैं, जो कर्मचारियों में देशभक्ति जगाता है। शिक्षा क्षेत्र में स्कूल अब छात्रों को तिरंगे के महत्व पर व्याख्यान देते हैं, और इसे फहराने की प्रक्रिया सिखाते हैं। हालांकि, कुछ चुनौतियां बनी रहीं, जैसे नकली या गलत आकार के ध्वजों का बाजार में बिकना, जिसके लिए BIS (Bureau of Indian Standards) ने मानक तय किए।

See also  ITR फाइलिंग अब होगी सुपर आसान: पहले से भरा फॉर्म मिलेगा, सिर्फ चेक कर एक क्लिक में सबमिट! 2026 से मिलेंगी ये नई सुविधाएं

प्रमुख नियम जो संशोधन से आए

फहराने का समय : सूर्योदय से सूर्यास्त तक, रात में रोशनी के साथ संभव।

स्थान : घर, कार्यालय, वाहन पर, लेकिन जमीन पर नहीं छूना चाहिए।

सम्मान : उलटा न फहराएं, क्षतिग्रस्त होने पर सम्मानजनक तरीके से नष्ट करें।

सामग्री : खादी, कॉटन, वूल या सिल्क से बना हो, सिंथेटिक न हो।

दंड : अपमान पर 3 साल तक की सजा या जुर्माना।

यह अधिकार अब भारतीयों के दैनिक जीवन का हिस्सा है, जहां राष्ट्रीय पर्वों के अलावा सामान्य दिनों में भी तिरंगा फहराया जाता है। नवीन जिंदल की लड़ाई ने साबित किया कि कानूनी मार्ग से सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है, और यह युवा उद्यमियों के लिए प्रेरणा है। उनकी पहल से Flag Foundation of India जैसी संस्थाएं बनीं, जो ध्वज के सम्मान को बढ़ावा देती हैं। कुल मिलाकर, यह कहानी दर्शाती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों तक पहुंच लोकतंत्र की मजबूती है।

Disclaimer: यह लेख ऐतिहासिक घटनाओं, न्यायिक फैसलों और सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित है। इसमें दिए गए टिप्स सामान्य जानकारी के लिए हैं और कानूनी सलाह नहीं माने जाएं। स्रोतों से प्राप्त जानकारी की सटीकता की जिम्मेदारी नहीं ली जाती।

Leave a Comment